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"गोनू झा" लेल 50 परिणाम भेटल:

साहित्य (Literature) FOLK_TALE ✓ मूल मैथिली

गोनू झा आ चोरक परीक्षा

रचयिता: गोनू झा • लोकगाथा

गोनू झाक बुद्धिमत्ता सँ चोर सभ किना स्वयं अपन जालमे फँसलाह, मिथिलाक प्रसिद्ध मनोरंजक लोककथा...

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गंगा का आशीर्वाद

रचयिता: गोनू झा • लोकगाथा

एक बार की बात है। गोनू झा का पुत्र बीमार पड़ गया । गाँव के वैद्य की चिकित्सा चली मगर वह ठीक नहीं हुआ। राज वैद्य से परामर्श लिया गया मगर व्यर्थ। राज वैद्य के निदान भी विफल हो गए । गोनू झा और पंडिताइन दोनों अपने पुत्र के स्वास्थ्य की चिन्ता में निमग्न...

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चोरों ने तौबा कर ली

रचयिता: गोनू झा • लोकगाथा

गोनू झा और चोरों के बीच आँख -मिचौली बरसों चलती रही। गोनू झा महाराज को वचन दे चुके थे कि उनके रहते मिथिला में चोरों का मनोबल बढ़ने नहीं दिया जाएगा । संयोग ऐसा रहा कि हमेशा चोरों को गोनू झा से मुँह की खानी पड़ी । दूसरी तरफ चोर बिरादरी के लोग लंगडू...

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कर्म ही पूजा है

रचयिता: गोनू झा • लोकगाथा

एक बार मिथिलांचल में भयंकर सूखा पड़ा । अनावृष्टि और अकाल से त्रस्त मिथिलावासियों के लिए अनाज का दाना तक मयस्सर होना कठिन हो गया । अनावृष्टि के कारण पेड़-पत्ते मुरझा गए। लोग त्राहि-त्राहि करने लगे । मिथिला नरेश ने अपनी प्रजा के लिए राज-गोदाम के...

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फिर छकायल चोर

रचयिता: गोनू झा • लोकगाथा

गोनू रहथि सतर्क आ बुद्धिमान लोक । अपन बुद्धिमत्ता आ विद्वताक बल पर ओ सदैव मिथिलाक राजदरवार मे आदर पाबथि आ यदा-कदा इनाम सेहो । ताहि सँ सौसें ई हल्ला रहैक जे गोनू झा लग बहुत रास संपत्ति छैन आ तें इलाकाक नामी-गिरामी चोर सभ हुनका घर मे चोरि करबाक प्लान...

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सूद-मूल बराबर

रचयिता: गोनू झा • लोकगाथा

गोनू झा अपने आरम्भिक दिनों में बहुत गरीब थे। दो जून की रोटी जुटाना उनके लिए कठिन था । ऐसे ही दिनों में घर में ऐसी जरूरत आ पड़ी जिसे टालना मुश्किल था । गोनू झा को महाजन के पास जाना पड़ा और उससे सूद पर दो सौ रुपए उधार लेना पड़ा । दिन बीतते गए। चाहकर...

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मिथिला से चोरों का सफाया

रचयिता: गोनू झा • लोकगाथा

मिथिलाँचल जिस तरह मछली और मखाने के लिए प्रसिद्ध रहा है, कभी यह चोरों के उत्पात के लिए भी उतना ही बदनाम था । मिथिला नरेश चोरों के उत्पात से तंग आ चुके थे । चोरी की घटनाओं में लगातार वृद्धि से राज्य की सुरक्षा-व्यवस्था के आगे सवालिया निशान आ खड़ा हुआ...

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रात का भाव

रचयिता: गोनू झा • लोकगाथा

गोनू झा एक रात सोए हुए थे। उनकी पत्नी गहरी नींद में उसी पलंग पर सो रही थी जिस पर गोनू झा सोए हुए थे । गोनू झा कच्ची नींद में थे। कहीं से आ रही खट- पट की आवाज से उनकी नींद उचट गई । उन्होंने ध्यान देकर इस आवाज को समझने की कोशिश की । आवाज बाहर वाले...

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दूध से भागने वाली बिल्ली

रचयिता: गोनू झा • लोकगाथा

मिथिला में एक बार चूहों की संख्या इतनी बढ़ गई कि लोगों का जीना हराम हो गया । चूहे खेत- खलिहान में उत्पात मचाते । धान की कोठियों में बिल बनाते । चौका में उछल-कूद करते । राजमहल भी चूहों की आमद का शिकार हो गया था । एक रात चूहे ने महाराज की पगड़ी कुतर...

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दाढ़ी के बाल से मुक्ति का मार्ग

रचयिता: गोनू झा • लोकगाथा

मिथिला नरेश के दरबार में एक तहसलीदार नया-नया बहाल हुआ था । लोगों से जबरन मालगुजारी वसूलकर वह महाराज की नजरों में अपना महत्त्व बढ़ाना चाहता था । लोग उसके रवैये से दुःखी थे। तहसलीदार गोनू झा के गाँव में पहुँचा और वहाँ भी अपने रुतबे के रोब में लोगों से...

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समान वितरण व्यवस्था

रचयिता: गोनू झा • लोकगाथा

एक दिन मिथिला नरेश के दरबार में एक साधु आया । नरेश ने उनकी आवभगत की । श्रद्धा से कर जोड़े। आशीष ग्रहण किया । साधु ने बताया कि वह चारों धाम का भ्रमण करके लौटा है । मिथिला में अपने यजमानों को प्रसाद बाँटता हुआ महाराज के पास उन्हें और उनके दरबारियों को...

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बौराये भोनू का बचाव

रचयिता: गोनू झा • लोकगाथा

भोनू झा गोनू झा के छोटे भाई थे । बड़े भाई के प्रति सम्मान भाव की कमी नहीं थी भोनू में, लेकिन उसे मलाल इस बात का था कि लोग जिस तरह गोनू झा को मानते और जानते हैं, उस तरह उसे नहीं । जो आता है वह गोनू झा से मिलने । जो भी पूछता है गोनू झा के बारे में...

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गोनूक नोकर

रचयिता: गोनू झा • लोकगाथा

गोनू झाक बुद्धिमत्ताक खिस्सा मिथिलाक घर-घर मे आइयो कहल-सुनल जा रहल अछि । गोनूक नोकर रहनि – वसुआ । वसुआ रहय सोझमतिया लोक आ ओकरा एहि बातक मलाल रहैक जे अपन गिरहथे जेंका ओहो चन्सगर किएक ने अछि । ओ बेर-बेर गोनू सँ आग्रह करैक – “मालिक हमरो अपन किछ गुण...

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पेड़ पर जेवर

रचयिता: गोनू झा • लोकगाथा

गोनू झा अपनी तीव्र बुद्धि के कारण न केवल मिथिला में प्रसिद्ध थे बल्कि उनकी प्रसिद्धि दूर-दराज तक पहुँच गई थी । उनके वाणी-चातुर्य की सराहना मिथिला नरेश कई बार भरे दरबार में कर चुके थे। गोनू झा के कारनामों की चर्चा नमक-मिर्च लगाकर, उनसे जलने वाले भी...

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पड़ोसी का पीढ़ा

रचयिता: गोनू झा • लोकगाथा

मिथिलांचल में खुशियों की सौगात लेकर आम मंजराए। गाँवों में बसन्त का आगमन उस साल कुछ ऐसा हुआ कि हर चेहरे पर रौनक बढ़ गई। आसार इस बात के थे कि आम खूब फलेंगे। मंजर बौरियों में बदले फिर टिकुलों में । टिकुलों ने आम का रूप लिया । मिथिलांचल के हर गाँव में...

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