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गोनू झा आ चोरक परीक्षा

लेखक: गोनू झा
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📖 पुस्तक / संग्रहक अंग

गोनू झाक हास्य लोकगाथा • अध्याय 55

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एक राति गोनू झाकेँ आभास भेलन्हि जे हुनक घरक पाछाँ किछु चोर लुकायल अछि। गोनू झा चतुर छलाह। ओ अपन पत्नीकेँ जोर सँ कहलन्हि— 'सुनैत छह! आई-काल्हिक चोर सभ बड़ उपद्रवी भऽ गेल अछि। हम अपन सब स्वर्ण-आभूषण आ धन एक भारी पेटीमे बान्हि कऽ खेतक इनारमे नुका कऽ राखि आयब।' चोर सभ ई बात सुनि कऽ प्रसन्न भऽ गेल। गोनू झा एक भारी बक्सा, जाहिमे केवल ईंट-पत्थर भरल छल, इनारमे फेकि देलन्हि। चोर सभ इनार सँ पानी उपचब शुरू कयलक जाहि सँ बक्सा निकालि सकय। राति भरि चोर सभ इनार उलीचैत रहल, आ गोनू झाक पूरा खेत पटि गेल। भोर भेल तँ गोनू झा हँसैत कहलन्हि— 'धन्यवाद भाइ सभ! हमर खेत पटायबाक लेल अहाँ सभकेँ मजदूरी की दियब?' चोर सभ लज्जित भऽ कऽ भागि गेल।
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गोनू झा

मिथिलाक जन-जनमे व्याप्त अमर विदूषक ओ प्रत्युत्पन्नमति पंडित। राजा शिवसिंहक समकालीन, हुनक चातुर्य कथा सर्वत्र विख्यात अछि।

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