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साहित्य (Literature)
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रचयिता: गोनू झा • लोकगाथा
गोनू झाक बुद्धिमत्ताक लोहा सभ कियो मानैत छल । अपन बुद्धिमत्तेक बल पर ओ मिथिलाक राजदरवार मे आदर पबैत छलाह । एक बेर मिथिला नरेशक मोन मे एकटा विचार आयल । ओ अपन सभ दरबारी के बजौलनि आ एक-एकटा विलाड़ि सभ कें दैत आदेश देलैन जे एहि बिलाड़ि के तीन महीन धरि...
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रचयिता: गोनू झा • लोकगाथा
गोनू वृद्ध हो चले थे। महाराज के दरबार में वे एक हस्ती बन चुके थे। एक दिन महाराज ने अपने पिता की पुण्य तिथि पर एक आयोजन किया । बृहद आयोजन था यह । ऐसे आयोजनों को गोनू झा व्यर्थ मानते थे। भोज के बाद गोनू झा ने विनयपूर्वक महाराज से पूछा-“महाराज ! इस...
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रचयिता: गोनू झा • लोकगाथा
मिथिला महाराज के दरबार में गोनू झा का सम्मान दिनों -दिन बढ़ता जा रहा था । उनके बढ़ते प्रभाव से महाराज के दरबार के अन्य दरबारी उनसे ईष्या करने लगे थे। वे पीठ पीछे गोनू झा के विरुद्ध विष-वमन करते रहते मगर मुँह पर कुछ भी बोलने का साहस नहीं जुटा पाते ।...
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रचयिता: हरिमोहन झा • कथा
खट्टर कका इनारक सब्जी पर बैसल कुरुड़ करैत रहथि । हम कहलिएन्ह - खट्टर कका ! अहाँक नाम तऽ दूर-दूर धरि प्रख्यात भऽ गेल । खट्टर कका बजलाह - हॅं , सुक्रिये नाम की कुक्रिये नाम ! तों तेहन-तेहन गप्प हमर छपौलह जे चारुकात पसरि गेल । संपूर्ण मिथिला में ।...
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रचयिता: गोनू झा • लोकगाथा
मिथिला नरेश का दरबार लगा हुआ था । सभा में गोनू झा भी उपस्थित थे। एक व्यक्ति एक छोटे संदूक के साथ दरबार में आया तथा उसने महाराज से बताया कि वह एक व्यापारी है । महाराज ने पूछा कि वह क्या बेचने आया है तब उस व्यापारी ने बड़े नाटकीय ढंग से कहा: " दूर देश...
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