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मैथिली लोक समग्र ज्ञान खोज

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"पाहुन" लेल 18 परिणाम भेटल:

साहित्य (Literature) STORY ✓ मूल मैथिली

प्रणम्य देवता : 3. विकट पाहुन

रचयिता: हरिमोहन झा • कथा

भादवक राति। साँझेसॅं जे झपसी लधलक से क्रमशः बढिते गेल। जखन एगारह बजे रोशनी मिझा गेलैक त समस्त होस्टल अन्हार कुप्प भऽ गेल। चारू कात निस्तब्ध। केवल फूही झहरबाक स्वर एक तालसॅं नीरवता भंग करैत छल। हमहूँ पुस्तक कैं सीरम मे राखि निद्रादेवीक आवाहन करय...

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साहित्य (Literature) STORY ✓ मूल मैथिली

प्रणम्य देवता : 4. साझी आश्रम

रचयिता: हरिमोहन झा • कथा

बर्तुहारीक प्रसंग मे बहुतो तरहक अनुभव लोक कैं प्राप्त भऽ जाइत छैक । एक ठाम हमरो तेहन भयंकर सत्कार भेल जे स्मरण कय औखन देह सिहरि उठैत अछि। घटकराज सोनमनि चौधरी कहलन्हि- अमुक गाम मे एकटा बड़ सुन्दर कथा हमरा नजरि मे अबैत अछि। ओ उच्च वंशक छथि, प्रायशः...

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साहित्य (Literature) STORY ✓ मूल मैथिली

चर्चरी : 14. अयाची मिश्र

रचयिता: हरिमोहन झा • कथा

प्रथम दृश्य (मातृ वन्दना-पाँँच बालक द्वारा सम्मिलित गान) (आसावरी) द्वितीय दृश्य (पंडित अयाची मिश्र पूजापर बैसल छथि। आगाँँमे धूप, दीप, नैवेद्य, फूल, सराइ, पंचपात्र, अर्घी, घंटी आदि।) (बालक शंकरक प्रवेश) शंकर-बाबूजी, नवद्वीपसॅं एकटा विद्यार्थी आएल...

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चर्चरी : 10. तिरहुताम

रचयिता: हरिमोहन झा • कथा

हमरा पुर्नियाँ जैबाक छल। परन्तु जे गाड़ी ७ बजे साँझमे कटिहार पहुँचबाक रहय से पहुँचल ९ बजे रातिमे। परिणाम ई जे कनेक्शन छूटि गेल। आब भोरमे ५ बजे गाड़ी भेटत। राति भरि एत्तहि स्टेशनमे रहय पड़त। अगत्या वेटिंग रूमक बाट धैलहुँ। कुली माथपर ट्रंक बिस्तर लऽ कऽ...

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चर्चरी : 19. चौपाड़िपरक गप्प

रचयिता: हरिमोहन झा • कथा

आहि दिन पं० जीक चौपाड़िपर नोतिहारी सभ बैसल रहथि। बिझौ भऽ गेल रहैक, परन्तु भोजनमे किछु विलंब रहैक। ताही बीचमे पहुँचि गेलाह भोलबाबा। हुनका अबितहि सभ उल्लसित भऽ उठल जे आब गप्पक छुरुक्का उड़त। काशीनाथ कहलथिन्ह - आउ बाबा ! भल्लह बेर पर जुमलहुँ । एखन यैह...

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साहित्य (Literature) STORY ✓ मूल मैथिली

चर्चरी : 8. सात रंगक देवी

रचयिता: हरिमोहन झा • कथा

(१) प्रायः ३० वर्ष पहिनेक गप्प कहै छी। हम बहिनक सासुर गेल रही। हुनक ससुर धर्मशास्त्राचार्य। साठि-सत्तरसे कम नहि छल होइथिन्ह। हम जखन खैबा काल आङन जाइ त ओ पं० जी आगाँ-आगाँ खड़ाम खटखटबैत, खखसैत, आङनक मुँह परसॅं गर्द करथिन्ह- हे! पाहुन आबि रहल छथि।' यदि...

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साहित्य (Literature) NOVEL ✓ मूल मैथिली

कन्यादान : अध्याय 7 - जटिल समस्या

रचयिता: हरिमोहन झा • उपन्यास

भोलानाथ झा भोजन-छाजन क उपरान्त भाउजि कैं कहलन्हि- हमरा फेरि स्टेशन जाय पड़त । एहि ठाम क सभटा भार अही लोकनि क उपर रहल । ठकबा अछिए । जे किछु मॅंगाबक हो से मॅंगा लेब । झुनियाँमाय कैं बराबरि एत्तहि रहय कहबैक । देखब कोनो बात क विथुति नहि हो । बहुत पैघ लोक...

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खट्टर ककाक तरंग : 22. पुरातन सभ्यता

रचयिता: हरिमोहन झा • कथा

ओहि दिन खट्टर कका सॅं पुरातन सभ्य्ता पर गप्प छिड़ि गेल । हम कहलिऎन्ह – देखू, खट्टर कका, ताहि दिनक ऋषि-मुनि केहन त्यागपूर्ण जीवन व्यतीत करथि ! गुफा-कंदरा में रहि कंदमूल खा तपस्या करथि। ब्राह्म मुहूर्त्त में उठि, नदी में स्नान कय, बल्कल पहिरने, कंमडलु...

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बीछल कथा : 1. कन्याक जीवन

रचयिता: हरिमोहन झा • कथा

-"हे औ पाहुन! देखू, फेर हमरा दस पड़ल। आब अहाँक गोटी कटा गेल।" -"ए तित्तिर दाइ! कन्ना नहि करू। अहाँकें दू खुदरा पड़ल अछि।" -"नहि! दस पड़ल अछि। एकटा कौड़ी चित्त छैक से नहि सुझै अछि?" -"नहि! दू टा कौड़ी चित्त छल। अहाँ कंगनासॅं घुसका देलिऎक ताहिसॅं एकटा पट...

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बीछल कथा : 3. आदर्श भोजन

रचयिता: हरिमोहन झा • कथा

हमर एक मित्र छथि शर्माजी । अमीर लोक कैं किछु ने किछु व्यसन रहिते छन्हि । हिनका नेचुरोपैथीक सनक छैन्ह । एक बेर हुनकर निमन्त्रण भेटल । ओ दुख छुटबाक उपलक्ष्य मे महाभोजक आयोजन कैने रहथि । हमरा देखितहि उल्लसित भऽ बजलाह - कहू, झाजी ! अहाँ कतय भोजन करब ?...

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खट्टर ककाक तरंग : 8. सत्यदेवक कथा

रचयिता: हरिमोहन झा • कथा

खट्टर कका भांगक हेतु सौफ-मरीच बिछैत रहथि । हम कहलिऎन्ह - खट्टर कका ! पूजाक हॅंकार देने जाइ छी । ख०- कथी क पूजा ? हम - आइ हमरा ओहि ठाम सत्यदेव क पूजा छैन्ह । ख०- सत्ते ? हम - सत्य नहिं त फूसि ? हमरा मूॅंह तकैत देखि खट्टर कका बजलाह - परन्तु हौ जी,...

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गोनू झा और उजालाक गाछ

रचयिता: गोनू झा • लोकगाथा

एक बेर ईरान सँ एकटा व्यापारी मिथिलाक दरबार मे आयल छल। ओ बहुत धनिक छल आ एखनो बहुत मुनाफा कमा क अपन देश वापस लौट रहल छल। रस्ता मे कतहु सुनने छल जे मिथिला मे विद्वानक कोनो कमी नै अछि। व्यवसायी सेहो विद्वान लोकनिक बहुत सम्मान करैत छल। ओ विचार केलक जे...

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खट्टर ककाक तरंग : 2. चाणक्यक जन्म-भूमि

रचयिता: हरिमोहन झा • कथा

खट्टर कका कैं ओहि दिन भाङ्ग घोटैत पुरातत्व्क सनक सवार भऽ गेलैन्ह। दूर-दूर क बात फूरय लगलैन्ह। हमरा देखितहि सोर कैलन्हि- हौ, कहाँ जाइ छह? एम्हर आबह । हम कहलिएन्ह- खट्टर कका, एकटा जरूरी काज अछि । खट्टर कका- जरूरी काज पाछाँ कऽ हैतैक। एखन एकटा टटका...

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चर्चरी : 2. मर्यादाक भंग

रचयिता: हरिमोहन झा • कथा

आइ पण्डितजीक आङनमे हूलिमालि उठल छैन्ह। कारण जे एक पाहुन आबि गेल छथिन्ह। सेहो विशिष्ट लोक। दुलारपुरक चौधरी। हुनक सेवा-सत्कार मे कोनो भाङठ नहि होमक चाही। परन्तु समस्या ई जे पं० जी कैं कचहरीक काज सॅं ऎखन लहेरियासराय जैबाक छैन्ह। आब की हो? पंडिताइन...

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कन्यादान : अध्याय 8 - गुप्त परामर्श

रचयिता: हरिमोहन झा • उपन्यास

-काग की दोस? -काग। -फक्का मुट्ठी बारह। आब लाबह बारहटा अंडी। -से त नहि होएतौह, हे सरौता! एतेक कन्ना नहि करह। एतबहि मे ढुनमुनकाकी ओहि ठाम पहुँचि गेलीह और बुच्ची दाई कैं फुलमतिया क संग काग-दोस खेलाइत देखि कहय लगलथिन्ह देखू त भला ई अकड़हड़! आइ हिनकर वर चल...

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