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साहित्य (Literature)
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रचयिता: गोनू झा • लोकगाथा
मिथिलांचल में साध- सन्तों में लोगों को काफी भरोसा है । गोनू झा के जमाने में भी था । गोनू झा के पिता सत्संग प्रेमी थे। साधु- सन्तों की सेवा करना अपना धर्म समझते थे। तांत्रिकों-ज्योतिषियों पर खर्च करने से भी वे पीछे नहीं रहते । गोनू झा ने उन्हें कई...
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रचयिता: गोनू झा • लोकगाथा
बात ओहि दिनक अछि जखन गोनू झा दरबार मे छलाह। मिथिला नरेश हुनका एक सप्ताह के लेल शाही अतिथि बना कऽ रोकने छलथि। गोनू झा पत्नी आ भाई भोनू झा गाम मे छल। घुरिया आ ओकर साथी सब हवालात में बंद छल। घुरियाक एकटा मित्र छल। ओकर नाम छल छुट्टन पासी। ओहो चोर छल। ओ...
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रचयिता: गोनू झा • लोकगाथा
गोनू झा एकटा राजाक दरबारी रहथि । ओ बहुत चतुर छलथि आओर राजाक राज-काज मे मदद करैत छलथि आओर हुनकर खूब मनोरंजन करैत छलथि । राजा हुनका बहु मानैत छलथिन्ह संगहि आओर लोक सेहो खूब मानैत छलैन्ह । हुनक उन्नति देखि कऽ सभ दरबारी डाह करैत छल आओर हुनका मिटा देबाक...
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रचयिता: गोनू झा • लोकगाथा
गोनू झा के वाक्चातुर्य और बुद्धि-कौशल पर मुग्ध थे मिथिला नरेश ! कोई भी उलझन आए, गोनू झा उसे चुटकियों में सुलझा लेते । राज्य की मर्यादा, राज्य के मान-सम्मान, दरबार की गरिमा, सत्ता के आदर्श, पड़ोसी राज्यों से कूटनीतिक सम्बन्ध, सीमान्त क्षेत्रों की...
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रचयिता: गोनू झा • लोकगाथा
पूरे मिथिलांचल के नौजवानों में खलबली मची हुई थी । प्रायः हर बेरोजगार नौजवान उस प्रतियोगिता की तैयारी में जुटा हुआ था जो महाराज के दरबार में एक माह बाद आयोजित होने वाली थी । महाराज ने पूरे राज्य में मुनादी करा दी थी कि उन्हें एक ऐसे सहयोगी की...
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रचयिता: गोनू झा • लोकगाथा
मिथिला नरेश की सभा में उनके बचपन का मित्र परदेश आया था। नरेश उन्हें अपने अतिथि कक्ष में ले गए। उन्होंने अपने मित्र की खूब आवभगत की। अचानक मित्र की नजर दीवार पर लगे एक चित्र पर गई, चित्र खरबूजे का था। मित्र बोला - कितने सुंदर खरबूजे हैं। वर्षों से...
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रचयिता: गोनू झा • लोकगाथा
गोनू झा अपने वाक्चातुर्य से सबका दिल जीत लेते थे। महाराज उनकी प्रतिभा के कायल थे। कठिन से कठिन अवसर पर गोनू झा का सुझाव उन्हें जंचता और वे उसे आजमाते । उलझनें सुलझ जातीं । प्रायः मिथिला नरेश भरे दरबार में गोनू झा के सुझावों की सराहना करते । समय-समय...
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रचयिता: गोनू झा • लोकगाथा
गोनू झा रहथि सतर्क लोक । यद्यपि ओ कोनो धनवान लोक नहि रहथि तथापि गौंआ आ अनगौंआ कें लगैक जे हो ने हो हुनका लग कोनो गाड़ल संपत्ति जरूर छनि । आ तें गामक वा अरोस-पड़ोस गामक चोर सभ हिनका घर मे चोरी करबाक युक्ति बनौलक । किछु दिन मंत्रणा कयलाक बाद दू तीन गोटे...
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रचयिता: गोनू झा • लोकगाथा
बात उन दिनों की है जब गोनू झा राजदरबार में नियुक्त नहीं हुए थे। तब वह गांव में खेती-बाड़ी करते थे और उनकी आर्थिक स्थिति कुछ खास नहीं थी। वह अपनी बुद्धि के प्रयोग से ही सारा काम करते थे। जैसे-तैसे घर-गृहस्थी का पालन-पोषण होता था। उनके गांव में भी हीरन...
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रचयिता: गोनू झा • लोकगाथा
मिथिला नरेश केर सभा मे हुनक बचपन के मित्र परदेश ऐल छल। नरेश हुनका अपन अतिथि कक्ष मे लऽ गेलैथ। ओ अपन मित्र के खूब आवभगत केलैथ। अचानक मित्र के नजैर दीवार पर लागल एकटा चित्र पर गेलनि। चित्र खरबूजा के छल। मित्र बजला - कतेक सुंदर खरबूजा अछि। बहुते दिन सँ...
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