द्विरागमन : अध्याय 6 - शिक्षाक प्रोग्राम
✍ हरिमोहन झा (1943)
मिस बिजली कैं छकैबाक हेतु सी० सी० मिश्रक पेट मे हर बहय लगलैन्ह । कखनो होइन्ह जे व्यायामशाला मे जा कऽ बौक्सिंग प्रैक्टिस करी । कखनो...
विद्यापति केर अमर पद सँ लऽ कऽ आधुनिक कथा, कविता, लोकगाथा आ बाल-साहित्य केर प्रामाणिक डिजिटल संग्रह।
कालजयी उपन्यास, व्यंग्य ग्रन्थावली आ लोककथा श्रृंखला सभ अध्यायवार उपलब्ध अछि:
✍ हरिमोहन झा (1943)
मिस बिजली कैं छकैबाक हेतु सी० सी० मिश्रक पेट मे हर बहय लगलैन्ह । कखनो होइन्ह जे व्यायामशाला मे जा कऽ बौक्सिंग प्रैक्टिस करी । कखनो...
✍ हरिमोहन झा (1943)
काशी स्टेशन पर उतरितहिं, यात्री-दल कैं चारू कात सॅं पंडाक झुण्ड घेरि कऽ चरो-बेरो कऽ लेलेकैन्ह। बाप-पितामहक नाम बूझि एक पंडा भोलानाथ आगाँ...
✍ हरिमोहन झा (1943)
बिजली देखलन्हि जे 'एक अनाड़ी फतिङ्गा मॅंडरा कऽ जान देबा पर वृत्त अछि । दया कऽ कऽ एकरा निर्दयतापूर्वक झाड़ि देवक चाही, नहि त ई झरकि कय...
✍ हरिमोहन झा (1943)
लालकाकी अमौटक हेतु आमक गाड़ा बनबैत छलीह कि आवेशरानी पहुँचि गेलथिन्ह । लालकाकी उल्लसित स्वर सॅं बजलीह - 'आबथु ऎ बहिना ! आइ त बिढ़नीक...
पन्डितजी विद्यालयसॅं ऎलाह त देखै छथि जे डेरामे ताला बंद अछि। बाहर कलपर पनिभरनीकेँ पानि भरैत देखि पुछलथिन्ह- की गय! मलकीनी कतय गेलथुन्ह...
✍ हरिमोहन झा (1930)
क्रमशः वर्षा थम्हि गेल। बिहाड़ियो बन्द भऽ गेल । आकाश निर्मल भऽ गेल। जखन भुरुकबा उगि गेलैक तखन बड़कागामवाली चुप्पहि उठि बूच्चीदाइक कोनट...
✍ हरिमोहन झा (1930)
झारखंडीनाथ तार क अर्थ घोंखैत-घोंखैत गाम दिशि विदा भेलाह । एही धुन मे मस्त भेल बढल चल अबैत छलाह कि पाछां कनपट्टी लग घंटी टनटना उठलैन्ह ।...
✍ हरिमोहन झा (1948)
ओहि दिन फगुआ रहैक । खट्टर कका तीन बेर पीबि चुकल छलाह और चारिम बेर तैयारी कय रहल छलाह । हम कहलिऎन्ह - खट्टर कका, ओहि फगुआ में अहाँ कहने...
✍ हरिमोहन झा (1948)
खट्टर कका दलान पर बैसल भाङ्ग घोटैत छलाह । हमरा अबैत देखि बजलाह – हॅं!- हॅं;....ओम्हर मरचाइ रोपल छैक, घूमि कऽ आबह। हम कहलिएन्ह - खट्टर...
✍ हरिमोहन झा (1948)
ओहि दिन खट्टर कका हमरा देखि पुछलन्हि - हौ, आइ बहुत दिन पर देखलिऔह । कहाँ छिटकल जाइ छह ? हम कहलिऎन्ह - खट्टर कका, अहाँ लग अबैत डर होइ अछि...
✍ गोनू झा
मिथिला नरेश केर सभा मे हुनक बचपन के मित्र परदेश ऐल छल। नरेश हुनका अपन अतिथि कक्ष मे लऽ गेलैथ। ओ अपन मित्र के खूब आवभगत केलैथ। अचानक...
✍ हरिमोहन झा (1948)
खट्टर कका भांगक हेतु सौफ-मरीच बिछैत रहथि । हम कहलिऎन्ह - खट्टर कका ! पूजाक हॅंकार देने जाइ छी । ख०- कथी क पूजा ? हम - आइ हमरा ओहि ठाम...